रविवार, 24 फ़रवरी 2013
Bund kavita
बूँद
अपरिमित शक्ति और विस्तार का
मात्र कुछ आभास देने के लिए
दूत अपना बनाकर
एक बूँद को प्रति रूप दे
भेजा धरा पर !
नहीं थे हाथ उसके पैर उसके
न लंबाई न चौड़ाई
न है कोई आकार उसका
देखा जा नहीं सकता
किसी भी यंत्र से जिसको
छू नहीं सकता जिसे कोई
उस बिंदू के अस्तित्व को
सार्वभौमिक मान्यता
आस्था विश्वास ने दी थी !
बूँद ने जन्म रेखा को दिया
जो किसी को दिख नहीं सकती
क्यूंकी चौड़ाई दी ही नहीं उसने !
बूँद की उस अद्रष्य उंगली ने
बुन कर रख दिया ज्ञान
और विज्ञान का संसार सारा
गणित भूगोल का विस्तार
कला और संगीत प्यारा !
हरेक कन में व्याप्त होकर
रचना पर नियंत्रण
कर रहा है वह !!!
शिवनारायण जौहरी 'विमल'
मंगलवार, 29 जनवरी 2013
Aaj ka Ravaan
आज का रावण
लंकेश ने सीता को कभी छुआ तक नहीं
राजा नहीं है भेड़िया है आज का रावण
सीता को लेने परदेस से आया था रावण
इस देश में ही रहने लगा आज का रावण
प्रतिकार के ही भाव से सीता हरी गई
अँधा हुआ है वासना से आज का रावण
वाज जैसा झपटता है अपने शिकार पर
ख़ूँख़ार परिंदों से होड़ कर रहा रावण
बीस खूनी पंज़ों से कोई कहाँ तक लड़े
दस दरिंदे मिल के बने हैं आज का रावण
जब चाहें जहाँ प्रकट हो जाता है दरिन्दा
क़ानून से मरता ही नहीं आज का रावण
शेर आदमख़ोर हो तो उसको मार देते हैं
सज़ाए मौत का हकदार है आज का रावण !!!!!!!!
शिवनारायण जौहरी 'विमल'
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लंकेश ने सीता को कभी छुआ तक नहीं
राजा नहीं है भेड़िया है आज का रावण
सीता को लेने परदेस से आया था रावण
इस देश में ही रहने लगा आज का रावण
प्रतिकार के ही भाव से सीता हरी गई
अँधा हुआ है वासना से आज का रावण
वाज जैसा झपटता है अपने शिकार पर
ख़ूँख़ार परिंदों से होड़ कर रहा रावण
बीस खूनी पंज़ों से कोई कहाँ तक लड़े
दस दरिंदे मिल के बने हैं आज का रावण
जब चाहें जहाँ प्रकट हो जाता है दरिन्दा
क़ानून से मरता ही नहीं आज का रावण
शेर आदमख़ोर हो तो उसको मार देते हैं
सज़ाए मौत का हकदार है आज का रावण !!!!!!!!
शिवनारायण जौहरी 'विमल'
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बुधवार, 29 अगस्त 2012
१८५७
सत्तावन का युद्ध खून से
लिखी गई कहानी थी
वृद्ध युवा महिलाओं तक
में आई नई जवानी थी
आज़ादी के परवानों ने
मर मिटने की ठानी
क्रांति संदेशे बाँट रहे थे
छदम वेश में वीर जवान
नीचे सब बारूद बिछी थी
ऊपर हरा भरा उद्धयान
मई अंत में क्रांतिवीर को
भूस में आग लगानी थी !
मंगल पांडे की बलि ने
संयम का प्याला तोड़ दिया
जगह जगह चिंगारी फूटी
तोपों का मुँह मोड़ दिया
कलकत्ता से अंबाला तक
फूटी नई जवानी थी !
मेरठ कानपुर में तांडव
धू धू जले फिरंगी घर
नर मुंडों से पटे रास्ते
गूँजे जय भारत के स्वर
दिल्ली को लेने की अब
इन रणवीरों ने ठानी थी !
तलवारों ने तोपें छीनी
प्यादों ने घोड़ो की रास
नंगे भूखे भगे फिरंगी
जंगल में छिपने की आस
झाँसी में रणचंडी ने भी
अपनी भृकुटी तानी थी !
काशी इलाहाबाद अयोध्या
में रनभेरी गूँजी थी
फर्रूखाबाद इटावा तक में
यह चिंगारी फूटी थी
गंगा यमुना लाल हो गई
इतनी क्रुद्ध भवानी थी !
आज़ादी की जली मशालें
नगर गाँव गलियारों में
कलकत्ता से कानपुर तक
गोली चली बाज़ारों में
तात्या बाजीराव कुंवर की
धाक शत्रु ने मानी थी !
दिल्ली पर चढ़ गये बांकुरे
शाह ज़फर सम्राट बने
सच से होने लगे देश
की आज़ादी के वे सपने
अँग्रेज़ों को घर जाने की
बस अब टिकिट कटानी थी !
लेकिन आख़िर वही हुआ
सर पत्थर से टकराने का
किंतु हार है मार्ग जीत
को वरमाला पहनाने का
बर्बरता को रौंध पैर से
मा की मुक्ति कराना थी !
आज़ादी का महासमर यह
चला निरंतर नब्बे साल
बदली युध नीतियाँ लेकिन
हा थो में थी बही मशाल
पंद्रह अगस्त को भारत ने
लिखी नई कहानी थी
आज़ादी की हुई घोषणा
दुनियाँ ने संमानी थी !!!!!!!!!
कवि---शिव नारायण जौहरी विमल
मंगलवार, 28 अगस्त 2012
वृंदावन
चंदन के जंगल में जैसे
रिमझिम बरस रहा हो सावन !
फूल फूल पर तितली नाचे
जूही सजाए कोई उपवन !
पवन गंध ऐसी फैला दे
डूब जाएँ तेरे मन !
घर घर की दुर्गंध बुहारे
खुशबू से भर जाए आँगन !
बरसे ऐसी सुधा चंद्रिका
गोरे हो जायें काले मन !
पीर बाँट ले हरेक पड़ोसी
घर मन बन जायें वृंदावन !
खुले रहें खिड़की दरवाज़े
नव विचार करते हो नर्तन !
गंगा की निर्मल धारा सा
बहता रहे सभी का जीवन !
नाच उठे धरती का कन कन
कुछ ऐसा छा जाए पागलपन
घर मन बन जाए वृंदावन !!!!!!!!!
कवि--शिवनारायण जौहरी विमल
नई गुलामी
पंद्रह अगस्त को
हुई सफल कुर्बानी
लिखने लगे नये भारत की
गौरव भरी कहानी !
किंतु आज धूमिल हो गये हैं
उज्जवल सपान सुहाने
निज स्वार्थ में डूब गये हैं
हम जाने अंजाने !
ह्मने एक विधान बनाया
हम उस ही के दास
फूँक नहीं सकते नाव जीवन
यह कैसा उपहास !
वोट दिया मालिक की हो गई
पाँच बरस की छुट्टी
लिए डोलता रोज हाथ में
अधिकारों की मिट्टी !
चोरों को दी चोकीदारी
यह कैसी लाचारी
अरबों खरबों के घपले हैं
लूटी संपदा सारी !
रंग बदलो या मौज मनाओ
लूट सोना चाँदी
मालिक है मजबूर देखकर
भी अपनी बर्बादी !
संविधान हथकड़ी बन गया
सत्ता की बन आई
प्रभुसत्ता है कहाँ इसी की
देते रहो दुहाई !
जागो देश के युवा तुम्ही को
फिर देना है कुर्बानी
भ्रष्टाचार दफ़न करके लिखना है
नई कहानी !!!!!!!!!!!
कवि-शिव नारायण जौहरी विमल
सोमवार, 27 अगस्त 2012
मेरा हिन्दुस्तान बचालो
मेरा देश बचालो कोई
लुटी जा रही चंदनबाडी
कोई रास सम्भालो बढ़कर
चढ जाए मेरा देश पहाड़ी
(१)
सूखी नदी प्यास के द्वारे
कुआ खोदन चले खिलाडी
सरपट दौड़ रहे हे पहिए
टूट गई रस्ते में गाड़ी
हरेक मिकेनिक बनकर आया
लेकिन निकले सभी अनाड़ी
मेरा देश------------------
(२)
घर में चलता रहा सिनेमा
बाहर लुटती रही बज़ारिया
कौए सब आज़ाद हो गये
फसी जाल में सोन चिरैया
जिनको लकवा मार गया है
वे क्यों चला रहे है गाड़ी
(३)
श्रावन ने कुवेर को बाँधा
राम क्षीर सागर में सोए
दशरथ के बेटा नहीं होता
शृंगी ऋषि समाधि में खोए
सीता रोज़ हरी जाती है
सबने की लंका से यारी
मेरा देश--------------------
(४)
चारों तरफ धूल की आँधी
बैठी साँस घुटन के का धे
उजली फिर हो जायें दिशायें
मुट्ठी भर कोई धूप दिखा दे
बेचैनी को इंतज़ार है
चमकदार मिल जाए खिलाड़ी !!!!
कवि--शिव नारायण जौहरी विमल
गुरुवार, 2 अगस्त 2012
रविवार, 29 जुलाई 2012
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