मंगलवार, 16 अगस्त 2011

gandarv vivah

गंधर्व विवाह
समय के पहाड़ से खोद कर
चलो तराश लायें कुछ लम्हे
चैन के सुकून के
पर यह क्या
तराशे हुए टुकड़े भी गमगीन हैं
लगता है गहरे पैठ गये हैं
असंतोष और निराशा !
पिरामिड और सददामों के देशो से
कितना अलग है
हमारा देश
हमारा हथियार है सत्याग्रह !
हमने तो सब्जीमंडी मैं
सहज भाव से केवल मंहगाई
को ही तो नोचा था पर वे तो
लगे जोड़ने उससे
भ्रष्टाचार की पूतना से
जोड़ बाकी करते करते
वे तक नहीं रहे थे
जैसे उनका गंधर्व विवाह
उस पूतना से हो गया था !
भेड बकरियों के मालिक
घास पत्ती डालते रहो
और दूध पीते रहो
झगड़े से क्या लाभ
हमारे मुँह पर रात भर
कुत्ता मूतता रहा
पर किसी ने
भगाया तक नहीं !
कैसी बन गई है
हमारी मानसिकता ?
अब जब एक के बाद एक
दस्तक आने लगी है
आमरण अनशन की
तब हम अंगड़ाई लेने लगे है !
एक बुड्दा बोला
कांप गये वे लोग
सूखे पत्ते की तरह
पर गंधर्व विवाह हो
या सबके सामने का
कोई आसानी से
छोड़ छुट्टी नहीं देता !
भोंकने वाले कुत्ते
छोड़े तो थे
पर कुछ हुआ नहीं !
लगता है जनता का साहस
सड़क पर आ गया है !
भ्रष्टाचार के यह फटते हुए पेट
यह मुह फड़ते लौकर
\ यह देशद्रोह का
घिनौना चहरा
यह बेनकाव भूत
माँगता है दंड फाँसी का !
इससे पहिले की मिट्टी
सूख कर पत्तथर हो जाए
गीली मिट्टी से नई मूर्तियाँ गद्दो
नई संरचना के लिए !!!!!!!
शिवनारायण जौहरी विमल

सोमवार, 15 अगस्त 2011

ek chehra

एक चेहरा
एक चेहरा
(मौत की दहलीज्ञ को पकड़े हुए बैठा रहा
उम्र जाने कब दबा कर पॉव आगे बढ़ गई)
उम्र ने झुर्रियाँ उकेर कर
बनाया था एक चेहरा
एक जीटा जागता टेरीकोटा
हरेक संघर्ष की झुर्री !
उसने इस्तीफ़ा तो पहीले ही
भेज दिया था
पर वह मंजूर नही हुआ
लौटा दिया था उपर वाले ने
कहा था खंडहर का क्या करेंगे
अर्थहीन प्रक्रिया होगी
खुरचन से काम चलाते रहो
वालन्ट्री रिटायरमेंट का
कोई प्रावधान नही है !
कहाँ तक चिल्लाकर बात करें
घर वाले बाहर वाले
कोलाहल पर लकीर फेर कर
दूर बैठा दिया है उसने
भजन में मन लगाने के लिए
लेकिन कान तो बजते ही रहते हैं
रात दिन
जाने कौन कौन सी
भूली बिसरी आवाज़ों की परछाईयाँ
पीछा करती रहतीं है !
बिचारी जीभ लड़खड़ा जाती है
शब्द उलझ जाते हैं
कोई सार्थक वाक्य बनता ही नहीं
सुनने वाला क्या समझे
झुंझल आने लगती है
अपने ही ऊपर !
कुछ खाता हूँ तो
ओठों के कोने से
लार टपक जाती है कपड़ों पर
कोई कहाँ तक बदले
कहाँ तक धोए
आगंतुक का चेहरा
देखा सा लगता है
नाम याद नहीं आता
बिचारा थोड़ी देर तक
बैठ कर चला जाता है
इतना में अचानक एक
खिड़की खुलती है
अरे वे तो मुन्ने मियाँ थे
मेरे बचपन के दोस्त
आँखों के गड्डो से
केवल झाईं दिखती है
चेहरा नही दिखता
पर दिखते रहते हैं
वे सपने जिनमें से
गुजरती रहतीं है यादें
जब मुन्ने मियाँ से
बैठ कर बातें करते
गुजर जाया करती थी
चाँदनी रात !!!!!
शिवनारायण जौहरी विमल

बुधवार, 10 अगस्त 2011

Apraadh mera naahi hai-----1-----shivnarayan johri

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abhaagi bahu

अभागी बहू
ब्याह के समैया पे
सपने संजोय कैसे
तितली सी उड़त फिरि
समूचे आसमान में
समुंदर में जैसे
ज्वार भाटा सो आत रओ
सपान सच होत नइया
एसे उछाह के !
पीहर में आई तो
करमन में गडडे मिले
पाथरा ही पथरा !
एसी कछु गिरी गाज
असुअन में डूब गई
सिगरी उमरिया !
"बजरी' खो मिली रोज़
गारिन की सौगात
डायन ने खाए लाए
अपने मताई बाप
पीहर में जीं गई
अपनो ही अचरा !
फटी फटी आखन में
देख रही घूर-घूर
जैसे खा जाएगी
हंम सबको जिगरा !
मौत पे तनिक ज़ोर
होतउ तो नैइयाँ
वरना मर जाती तभई
धनी के समुहियाँ !
फटे जात कान सुनत
रोज़ की जे गरियाई !
बैठ गए घन धरती पे
घर के ही कौआ !
लूट लाई सबने मिल
सारी बजरिया !
चूल्‍हे में गयो दुलार
रोवत है मढ़ा द्वार
छूटो सिंघार प्यार
छूट गयो पलका !
धरती की सेज़ मिली
लुगडी एक कटी फटी
जूनो सो लहंगा
और हाथन में रह गए
झाडू और पौछा !
वाह! री दुनिया
औरत ही औरत ख़ान
खाबे को दौड़ रही
अपनोपन खड़ो खड़ो
आँसू टपकात जात
अभागी बहुरिया खों मिली
यह भीगी सौगात !!!
शिवनारायण ज़ोहरी "विमल"

andhkaar

अंधकार
संध्या के समय थके हुए सूरज
की आँखें लाल हो जाती हैं
गरमी शांत हो जाती है
और धीरे-धीरे
डूब जाता है वह
क्षितिज के उसपार
तब उभर जाता है
अंधकार..
वह भी
भय प्रकट कृपाला की तरह
प्रकट हो जाता है
किसी की कोख से जन्म नहीं लेता..
प्रकाश आश्रित होता है
किसी प्रकाशपुंज पर और
किरनो का फैला जाने के लिए
दूर तक फैल जाने के लिए
अंधकार को न किसी
श्रोत की ज़रूरत न वाहन की...
उसके साम्राज्य का अस्तित्व
तो पहिले भी था पर
छिपा लिया था सूरज
की चकाचौध ने.....
सच तो यह है कि
यह ब्रम्‍हांड लिपटा हुआ है
आसमान की तरह
अंधकार की मोटी चादर में.
वह तो शायद सूरज के
बनने के पहीले से
विध्यमान रहा होगा !
अंधेरे में ही ब्रम्‍हान्ड की रचना
शुरू हो गई होगी..!
अंधकार क्रोध है निराशा है
मन की हार है अनास्था है
भय है अग्यान है
प्रकाश का अत्यांतिक अभाव है
वह प्रश्रय देता है चोरी जुआ
अनाचार अत्याचार को !
अंधकार के झंडे तले
डूब जाते है भेद भाव
सारे के सारे
नाकाम हो जाती है
धरती को बाँटने की साज़िश
अर्थहीन हो जाते है
वे बुलंद नारे
जो चीख-चीख कर कहते थे
पहाड़ तुम्हारे मैदान हमारे
ग़रीबी तुम्हारी करोड़ों हमारे!
आँसू तुम्हारे ठहाके हमारे!
उन पर स्याही
फेर देता है अंधकार !
कोलाहल ठहर जाता है
और प्रशांत सागर सा
एक अज़ीब सन्नाटा
एक अज़ीब सा एकांत
छा जाता है दिग दिगान्तों तक !
भीतर की आँख ढूँढने लगती है
उसको जो यहीं कहीं रहता है !
पनपने लगता है इंतज़ार !
आ रहा है वह
सुनाई दे रही है
उसकी पदचाप
वह आएगा कश्ती लेकर
और ले जाएगा
सागर के पार अपनी दुनिया में !
इस तरह अंधकार को
तुम जियो तब तक
जब तक कि मन
ईश्वरोन्मुख ना हो जाए !
और अंधकार को पियो
तब तक जब तक
की आँख के आगे
सबेरा न हो जाए !!!
शिवनारायण जौहरी विमल