शुक्रवार, 3 जून 2011
शनिवार, 23 अप्रैल 2011
शुक्रवार, 18 मार्च 2011
सोमवार, 23 अगस्त 2010
जिजीविषा---------मरते रहते थे इन्सान
मरते रहते थे इन्सान
स्वारथ से सब देश बंधे हैं
मानवता की कौन सुने ।
जिसके पास अहिंसक मन है
उस अबला की कौन सुने।।
ट़ेङ सेंटर ध्वस्त हुआ क्या
तब से जलने लगा जहान।
इसके पहिले बहुत शाँति से
मरते रहते थे इन्सान ।।
कब से जलता कश्मीर है
किसने इसकी सुनी पुकार ।
भारत कब से झुलस रहा है
होता जन-जन का संहार।।
निरपराध मर रहे हजारों
अँधी बंदूकों के हाथ ।
घृणा और बर्बरता दोनों
नंगे नाच रहे हैं साथ।।
राख हो गए उनके सपने
सडकों पर बहता है खून ।
बिलख रहा बचपन अनाथ सा
वहशीपन पर चढा जनून ।।
कितने बालक वृध्द निहत्थे
गोली पर हो गए सवार ।
कितनी मांगे पुछीं रह गई
विधवा कितना हुआ दुलार ।।
नयन मूँद कर विष्णु सो गए
धरती करती रही पुकार ।
हाथ बाँध आसरा तकोगे
इससे क्या होगा उपचार ।।
खाण्डव वन में आग लगी है
मौत मचाए हाहाकार ।
अब गांडीव उठा लो अर्जुन
जड पर सीधा करो प्रहार ।।।।।
शिवनारायण जौहरी विमल
शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
जिजीविषा-------------ठहरा हुआ आसमाँ
ठहरा हुआ आसमाँ
ठीक सब कुछ वही है
हाँ । वही तो है
कुछ बदलता नहीं है
एक चिडिया ने वही अपना
चिरपिराहट का पुराना गीत
फिर गाया ।
ठहरा हुआ सा आसंमाँ
ठहरा हुआ यह पल
कि जैसे एक पहिया
कर्ण के रथ का
धरा में धँस गया हो।
खिलखिलाती जा रही सरिता
दहाडे मारता सागर
पूर्ववत ठहरे हुए हैं
और सारे राग सारे रंग
जैसे सो रहे हैं
लोरियों में भीग कर ।
हरी सी मखमली कोयल
गोद में लेटी हुई है
लाडले माँ के
वह प्रकृति भी
एक शाश्वत सत्य है
ऐसा गुमाँ होने लगा है।।।
शिवनारायण जौहरी विमल
मंगलवार, 3 अगस्त 2010
जिजीविषा------बचपन
बचपन
बदलते हुए ऊषा के
रंगों से भीग कर
गूँजती शहनाई से
दूर दूर प्रान्तर में
स्वर मिलाती हुई
तरंगायित लहरों पर
गुलाबी सी कोर लगा
नव-जात शिशु जैसा
झाँकता सबेरा ।
किसलय से मकरंदित
वायु के झकोँरोँ ने
फूलों लदी डाली से
बरसाए सुमन और
हरी-भरी धरती को
चादर से ढाँक दिया।
नींद में मचल रहे
किलबिल से जीवन की
भूख को बुझाने चले
चुग्गा को ढूँढ रहे
उन फैले डैनों से
लिपट गया ऊषा
के आँचल को
चूमता सबेरा।
और वहीं गोदी में
सुनहले से पारदर्शी
प्यार ने दुलार ने
कर लिया बसेरा
मुस्काते तुतलाते
अस्फुट स्वरों में सना
दिन का वह बचपन ही
बचपन था मेरा।।।।।।
शिवनारायण जौहरी विमल
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
जिजीविषा--------विहान
विहान
घूँघट हटाते रूप के सौंदर्य को
हर पल भिंगोती बांसुरी की धुन
वारूणी सी पी रही मधुमास की
पायल थिरकती जा रही रून-झुन ।
बादलों के दो रूपहले शावकों से
खेलती है उषा की सोनार अलकें
प्यास के गीले अधर ज्यों चूमते हों
भोर की अधखुली पलकों के किनारे।
क्षितिज से माँग कर लाई पवन ज्यों
तुम्हारे चरण धो कर पी रही ऊषा सुनहरी
धरा की सांस को नहला रहा गंधी परागन
दिशाएँ चूमतीं मदहोश पागल सी रंगीली ।
एक पंछी पंख फैला उड. रहा आकाश में
चिरपिराती झाडियों में छोडकर अपना बसेरा
रात के सपने सुनाए जा रही चिडिया बसंती
नदी तट पर नया जीवन ले रहा अंगडाईयाँ सी।।।।।
शिवनारायण जौहरी विमल
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